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शब्द हैं विचार हैं

शब्द हैं विचार हैं । शब्दों में विचार है, या विचारों में शब्द है । कभी विचार हैं तो शब्द नहीं, और कभी शब्द हैं तो विचार नहीं । न विचार सदा रहे बंधे, शब्दों के जाल में । न शब्द सर्वदा रहे, विचारों के प्रभाव में । शब्द जो निशब्द है, विचार सब व्यर्थ है । विचार जो भ्रांत है, शब्द सब निरर्थ हैं । उपयुक्त विचार अयुक्त शब्द, युद्ध का प्रारब्ध है । कुटिल विचार मृदु शब्द, विध्वंस का आरम्भ है । शब्द व विचार के इस युद्ध को विराम देकर । विचारों के सागर से शब्दों के मोती निकालकर , उन मोतियों को विचारों के धागों में पिरोने वाला । जिसने इनका निष्कलंक संतुलन है पाया, वही उत्तम मनुष्य है कहलाया ।

कृष्ण का आह्वान

तू कृष्ण है तू गोपाल है ,विराट रूप विकराल है तू सुदामा का यार है ,राधा का प्यार है तू कंस का काल है ,महाभारत का सार है धर्म का है रक्षक तू दुष्टों का संहारक है। तू सबमे है सब तुझमे हैं , सब तेरा है तू सबका है तू जीवन में है मरण में है तू सबके अन्तःकरण में है। हे कृष्ण, तेरी सृष्टि में पापी फिर कर रहे राज हैं  यहाँ पाप में तो पाप है और पुण्य में भी पाप है। तू इस रूप में आ या उस रूप में आ, नटखट नन्दलाल बन के आ या कल्कि अवतार लेके आ पाप पुण्य के इस द्वन्द को मिटाने  गीता का नया सार लिखने, तुझे आना ही होगा। बस ! बहुत हो गया अब  तुझे आना ही होगा,तुझे आना ही होगा  हे कृष्ण, तुझे आना ही होगा। - The Priest

सकारात्मक

चला जा रहा हूँ , चला जा रहा हूँ | उँचे पहाड़ों पे , उठता हुआ मैं | चला जा रहा हूँ , चला जा रहा हूँ | नीचे है घाटी या कोई समुंदर | गहराई में गिरता , चला जा रहा हूँ | चला जा रहा हूँ , चला जा रहा हूँ | वो कानन, कुसुम और कोमल से नभचर | वो उँची उड़ाने , चला जा रहा हूँ | वो नाचते निर्झर , वो नीर निरंतर | कल-कल का गुंजन , चला जा रहा हूँ | हरी सी वो चादर जो खुद मे लपेटे | वो भूरा सा भूदर, चला जा रहा हूँ | वो स्वेत सा ओढन, जो लगता है अंबर | मेघों मे भीगता मैं, चला जा रहा हूँ | हैं साथी जो पथ मे वो साथ समान्तर | कर में मैं कर कर , चला जा रहा हूँ | चला जा रहा हूँ , चला जा रहा हूँ | उँचे पहाड़ों पे , उठता हुआ मैं | चला जा रहा हूँ , चला जा रहा हूँ |                  

सम्वेद्ना - Samvedna

किसी गली मे हमने एक मकान देखा रहते लोग कई उसमे, हर किसी को एक दूसरे से अन्जान देखा मानते हैं वो खुशियाँ साथ मे कभी कभी पर गम मे उस घर को हमने सुनसान देखा ना सम्वेद्नाओ की गूँज है कहीं उनमे ना एक-दूसरे के दर्द से पहचान देखा हर कोई मशरूफ है अपनी जिंदगी की उलझानो में हमने इन्ही उलझानो मे हर किसी को परेशान देखा है नही वक़्त उनको की देखें वो औरो को भी हर किसी को बस अपनी जिंदगी मे हैरान देखा किसी गली मे हमने एक मकान देखा रहते लोग कई उसमे, हर किसी को एक दूसरे से अन्जान देखा कभी बस्ती ये भी थी प्यार करने वालो की एक-दूसरे से मिल-जुल के रहने वालो की पर आज हमने इसे बियावान देखा तो क्या कहेंगे आप उस गली को जिसमे हमने ये मकान देखा हमको तो लगती है ये मुर्दों की बस्ती है और हमने यहाँ बस शमशान देखा                                    -- Anynoymous

आभार - by Shiv Mangal Singh 'Suman'

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं, सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं। दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद -- जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद - By Ramdhari Singh Dinkar

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव है । उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है । जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते । और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का आज उठता और कल फिर फूट जाता है । किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है । मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली, देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू? स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी, आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू? मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ । और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की, इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ । मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी कल्पना की जीभ में भी धार होती है । वाण ही होते विचारों के नहीं केवल, स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है। स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे । रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को, स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे...

तूफानों की ओर घुमा दो - Shivmangla Suman

Loved this inspirational poem :) आज सिन्धु ने विष उगला है लहरों का यौवन मचला है आज ह्रदय में और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार लहरों के स्वर में कुछ बोलो इस अंधड में साहस तोलो कभी-कभी मिलता जीवन में तूफानों का प्यार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार यह असीम, निज सीमा जाने सागर भी तो यह पहचाने मिट्टी के पुतले मानव ने कभी ना मानी हार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार सागर की अपनी क्षमता है पर माँझी भी कब थकता है जब तक साँसों में स्पन्दन है उसका हाथ नहीं रुकता है इसके ही बल पर कर डाले सातों सागर पार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार ।।

वीर - by Ramdhari Singh "Dinkar"

सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नही विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं मुँह से न कभी उफ़ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं, शूलों का मूल नसाते हैं, बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं। है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके आदमी के मग में? खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़, मानव जब ज़ोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है। गुण बड़े एक से एक प्रखर, है छिपे मानवों के भीतर, मेंहदी में जैसे लाली हो, वर्तिका-बीच उजियाली हो, बत्ती जो नही जलाता है, रोशनी नहीं वह पाता है।      - Ramdhari Singh Dinkar

कर्मवीर - By Ayodhaya Singh Upadhaya "Hariaudh"

I came across this one more poem by Ayodhaya Singh Upadhaya yesterday and found it very motivating .                 देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं।                रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं                काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नही                भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं।।                हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले                सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।।                आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही                सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही                मानते जो भी है सुनते हैं सदा सबकी कही           ...