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What If

What if The wait is eternal The place is stuck The Journey is worst Its just a rewind button What if The helplessness is extreme you remain just a audience without any control the death is cruel than life You won't get a second chance if it happens wait wait and wait cause death will come anyway u will get to know anyway better to know the life here  Death is a wish fulfilled anyway  why to wish for it everyday

शब्द हैं विचार हैं

शब्द हैं विचार हैं । शब्दों में विचार है, या विचारों में शब्द है । कभी विचार हैं तो शब्द नहीं, और कभी शब्द हैं तो विचार नहीं । न विचार सदा रहे बंधे, शब्दों के जाल में । न शब्द सर्वदा रहे, विचारों के प्रभाव में । शब्द जो निशब्द है, विचार सब व्यर्थ है । विचार जो भ्रांत है, शब्द सब निरर्थ हैं । उपयुक्त विचार अयुक्त शब्द, युद्ध का प्रारब्ध है । कुटिल विचार मृदु शब्द, विध्वंस का आरम्भ है । शब्द व विचार के इस युद्ध को विराम देकर । विचारों के सागर से शब्दों के मोती निकालकर , उन मोतियों को विचारों के धागों में पिरोने वाला । जिसने इनका निष्कलंक संतुलन है पाया, वही उत्तम मनुष्य है कहलाया ।

कर्ण और कृष्ण का संवाद - रामधारी सिंह 'दिनकर'

Following is excerpt from poem Rashmirathi written by Ram dhari singh dinkar. Karna reply to Krishna when he told story of his birth and ask him to join pandava side. सुन-सुन कर कर्ण अधीर हुआ, क्षण एक तनिक गंभीर हुआ,  फिर कहा "बड़ी यह माया है, जो कुछ आपने बताया है  दिनमणि से सुनकर वही कथा मैं भोग चुका हूँ ग्लानि व्यथा  मैं ध्यान जन्म का धरता हूँ, उन्मन यह सोचा करता हूँ,  कैसी होगी वह माँ कराल, निज तन से जो शिशु को निकाल  धाराओं में धर आती है, अथवा जीवित दफनाती है?  सेवती मास दस तक जिसको, पालती उदर में रख जिसको,  जीवन का अंश खिलाती है, अन्तर का रुधिर पिलाती है  आती फिर उसको फ़ेंक कहीं, नागिन होगी वह नारि नहीं  हे कृष्ण आप चुप ही रहिये, इस पर न अधिक कुछ भी कहिये  सुनना न चाहते तनिक श्रवण, जिस माँ ने मेरा किया जनन  वह नहीं नारि कुल्पाली थी, सर्पिणी परम विकराली थी  पत्थर समान उसका हिय था, सुत से समाज बढ़ कर प्रिय था  गोदी में आग लगा कर के, मेरा कुल-वंश छिपा कर के  दुश्मन का उसने काम किया, माताओं को बदनाम किया  माँ...

सम्वेद्ना - Samvedna

किसी गली मे हमने एक मकान देखा रहते लोग कई उसमे, हर किसी को एक दूसरे से अन्जान देखा मानते हैं वो खुशियाँ साथ मे कभी कभी पर गम मे उस घर को हमने सुनसान देखा ना सम्वेद्नाओ की गूँज है कहीं उनमे ना एक-दूसरे के दर्द से पहचान देखा हर कोई मशरूफ है अपनी जिंदगी की उलझानो में हमने इन्ही उलझानो मे हर किसी को परेशान देखा है नही वक़्त उनको की देखें वो औरो को भी हर किसी को बस अपनी जिंदगी मे हैरान देखा किसी गली मे हमने एक मकान देखा रहते लोग कई उसमे, हर किसी को एक दूसरे से अन्जान देखा कभी बस्ती ये भी थी प्यार करने वालो की एक-दूसरे से मिल-जुल के रहने वालो की पर आज हमने इसे बियावान देखा तो क्या कहेंगे आप उस गली को जिसमे हमने ये मकान देखा हमको तो लगती है ये मुर्दों की बस्ती है और हमने यहाँ बस शमशान देखा                                    -- Anynoymous

पथ की पहचान - Path ki Pehchan

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले। पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की जबानी अनगिनत राही गए इस राह से उनका पता क्या पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है खोल इसका अर्थ पंथी पंथ का अनुमान कर ले। पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले। यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना तू इसे अच्छा समझ यात्रा सरल इससे बनेगी सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले। पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले। है अनिश्चित किस जगह पर सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे किस जगह यात्रा खतम हो जाएगी यह भी अनिश्चित है अनिश्चित कब सुमन कब कंटकों के शर मिलेंगे कौन सहसा छू जाएँगे मिलेंगे कौन सहसा आ पड़े कुछ भी रुकेगा तू न ऐसी आन कर ले। पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।             ...

My Comfort Zone

I used to have a comfort zone where I knew I wouldn't fail. The same four walls and busywork where really more like jail. I longed so much to do the things I’d never done before, But stayed inside my comfort zone and paced the same old floor. I said it didn’t matter that I wasn’t doing much. I said I didn't care for things like commission checks and such. I claimed to be so busy with the things inside my zone, But deep inside I longed for something special of my own. I couldn’t let my life go by just watching others win. I held my breath; I stepped outside and let the change begin. I took a step and with new strength I’d never felt before, I kissed my comfort zone good-bye and closed and locked the door. If you’re in comfort zone, afraid to venture out, Remember that all winners were at one time filled with doubt. A step or two and words of praise can make your dreams come true. Reach for your future with a smile; Success is there for you!...

मधुशाला - Madushala by Harivansh Rai Bacchan

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१। प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला, एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला, जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका, आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२। प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला, अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला, मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता, एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३। भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला, कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४। मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला, भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला, उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ, अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५। मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में ...

Krishna ki Chetavani (Rashmirathi) - Ramdhari Singh Dinkar

वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। 'दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका, उलटे हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- 'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? ...

पुष्प की अभिलाषा by Makhanlal Chaturvedi

पुष्प की अभिलाषा चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊँ चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जावें वीर अनेक ।।                         -माखनलाल चतुर्वेदी

किसको नमन करूँ मैं भारत? - Kisko Naman Karu Mein Bharat?

A poem dedicated to the nation written by Ramdhari Singh "dinkar"... तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ? मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ? किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ? भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ? नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ? भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ? भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं ! खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं ! दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं मित्र-भाव की ओर विश्व की ...

यात्रा और यात्री - Yatra Aur Yatri by Harivansh Rai Bacchan

साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! चल रहा है तारकों का दल गगन में गीत गाता चल रहा आकाश भी है शून्य में भ्रमता-भ्रमाता पाँव के नीचे पड़ी अचला नहीं, यह चंचला है एक कण भी, एक क्षण भी एक थल पर टिक न पाता शक्तियाँ गति की तुझे सब ओर से घेरे हुए है स्थान से अपने तुझे टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर! साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! थे जहाँ पर गर्त पैरों को ज़माना ही पड़ा था पत्थरों से पाँव के छाले छिलाना ही पड़ा था घास मखमल-सी जहाँ थी मन गया था लोट सहसा थी घनी छाया जहाँ पर तन जुड़ाना ही पड़ा था पग परीक्षा, पग प्रलोभन ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू इस तरफ डटना उधर ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! शूल कुछ ऐसे, पगो में चेतना की स्फूर्ति भरते तेज़ चलने को विवश करते, हमेशा जबकि गड़ते शुक्रिया उनका कि वे पथ को रहे प्रेरक बनाए किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने के लिए मजबूर करते और जो उत्साह का देते कलेजा चीर, ऐसे कंटकों का दल तुझे दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर साँस चलती है तुझे चलन...

Agneepath (अग्निपथ) – A poem by Harivansh Rai Bachchan

वृक्ष हों भले खड़े हों घने, हों बड़े एक पत्र छाँह भी मांग मत! मांग मत! मांग मत! अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! तू न थकेगा कभी तू न थमेगा कभी तू न मुड़ेगा कभी कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! यह महान दृश्य है चल रहा मनुष्य है अश्रु-स्वेद-रक्त से लथ-पथ! लथ-पथ! लथ-पथ! अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!                                                       Harivansh Rai Bachchan

आभार - by Shiv Mangal Singh 'Suman'

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं, सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं। दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद -- जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद - By Ramdhari Singh Dinkar

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव है । उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है । जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते । और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का आज उठता और कल फिर फूट जाता है । किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है । मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली, देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू? स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी, आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू? मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ । और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की, इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ । मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी कल्पना की जीभ में भी धार होती है । वाण ही होते विचारों के नहीं केवल, स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है। स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे । रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को, स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे...

वसुधा का नेता कौन हुआ

सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, शूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं।