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Don't Quit

When things go wrong as they sometimes will; When the road you're trudging seems all uphill; When the funds are low, and the debts are high And you want to smile, but have to sigh; When care is pressing you down a bit- Rest if you must, but do not quit. Success is failure turned inside out; The silver tint of the clouds of doubt; And you can never tell how close you are It may be near when it seems so far; So stick to the fight when you're hardest hit- It's when things go wrong that you must not quit                                - Anonymous

नेताजी

" जो कुछ अच्छा हुआ , वह हमने किया , जो कुछ बुरा हुआ , वह किया अधिकारियों ने , यह सीधी बात नहीं समझती जनता , ख़ुद भी होती है परेशान , हमें भी करती है परेशान. कुछ मत देखो , कुछ मत सुनो , कुछ मत कहो , बस हमें वोट देते रहो "

चलना हमारा काम है (chalna hamara kaam hai ) - Shiv mangal singh 'suman;

गति प्रबल पैरों में भरी फिर क्यों रहूँ दर दर खड़ा जब आज मेरे सामने है रास्ता इतना पड़ा जब तक न मंज़िल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है, चलना हमारा काम है। कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया कुछ बोझ अपना बँट गया अच्छा हुआ, तुम मिल गईं कुछ रास्ता ही कट गया क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है, चलना हमारा काम है। जीवन अपूर्ण लिए हुए पाता कभी खोता कभी आशा निराशा से घिरा, हँसता कभी रोता कभी गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठो याम है, चलना हमारा काम है। इस विशद विश्व-प्रहार में किसको नहीं बहना पड़ा सुख-दुख हमारी ही तरह, किसको नहीं सहना पड़ा फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है, चलना हमारा काम है। मैं पूर्णता की खोज में दर-दर भटकता ही रहा प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ रोड़ा अटकता ही रहा निराशा क्यों मुझे? जीवन इसी का नाम है, चलना हमारा काम है। साथ में चलते रहे कुछ बीच ही से फिर गए गति न जीवन की रुकी जो गिर गए सो गिर गए रहे हर दम, उसीकी सफलता अभिराम है, चलना हमारा काम है। फकत यह जानता जो मिट गया वह जी गया मूँदकर पलकें सहज दो घूँट हँसकर पी...

झाँसी की रानी ( Jhanshi ki rani ) by Subhadra Kumari Chauhan

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात, कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात, उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात? जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात। बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार, उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार, सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार, 'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'। यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अ...

If you think you can , You will

If you think you are beaten, you are. If you think you dare not, you don’t If you like to win but think you can’t, It’s almost a cinch you won’t. If you think you’ll lose, you’re lost. For out in the world we find Success begins with a fellow’s will It’s all in the state of mind. If you think you are outclassed, you are. You’ve got to think high to rise. You’ve got to be sure of yourself before You can ever win the prize. Life’s battles don’t always go To the stronger or faster man. But sooner or later, the man who wins Is the man who thinks he can.                                           - C.W. Longenecker                         

Jis Bargad ki Chaav tale - A very Realistic poem by Prem Shankar Raghuvanshi

जिस बरगद की छाँव तले रहता था मेरा गाँव। वह बरगद खुद घूम रहा अब नंगे नंगे पाँव। रात-रात भर इस बरगद से किस्से सुनते थे गली द्वार बाड़े के बिरवे जिनकी गुनते थे बाखर बाखर कहीं नहीं थी कोई भी खाई पशु-पक्षी मौसम जड़ चेतन थे भाई-भाई किंतु अचानक उलटी-पलटी संबंधों की नाव। इस बरगद का हाल देखकर अम्मा रोती है भूख खेत में खलिहानों में अब भी सोती है नहा रही कीचड़ पानी से घर की मर्यादा चक्रवात चाहे जब उठते पहले से ज़्यादा हुए बिवाई से घायल अब चंचलता के पाँव। भौजी अब ममता के बदले देती है गाली दूर-दूर तक नहीं दीखती मन में हरियाली चौपालों से उठीं बरोसी आँगन से पानी दूर-दूर तक नहीं सुनाती कबिरा की बानी कथनी करनी न्यारे-न्यारे चलते ठाँव-कुठाँव। पंचायत पर पंच परोसे शासन भी वादे राजनीति ने बड़े-बड़े कर, कर डाले आधे शहरों से पुरवा का बढ़ता सम्मोहन दूना मुखिया मुख ढांके विवेक पर लगा रहे चूना लरिकाई की प्रीत न रच पाती अब मीठे दाँव। धीरे-धीरे सीलन घर के घर खा जाती है आपस में मिलने की गर्मी असर न पाती है समा रहा दलदल के जबड़े में पूरा खेड़ा सब मिल अब ऊँची धरती पर रख लो ...

Matribhumi - A Poem by Sohan Lal Dwivedi

Sometimes patriot poems becomes very attractive and fill you with a unique kind of joy , This poem Matribhumi by Sohan Lal Dwivedi ji is one of such poems , read it and enjoy it :) मातृभूमि ऊँचा खड़ा हिमालय आकाश चूमता है, नीचे चरण तले झुक, नित सिंधु झूमता है। गंगा यमुन त्रिवेणी नदियाँ लहर रही हैं, जगमग छटा निराली पग पग छहर रही है। वह पुण्य भूमि मेरी, वह स्वर्ण भूमि मेरी। वह जन्मभूमि मेरी वह मातृभूमि मेरी। झरने अनेक झरते जिसकी पहाड़ियों में, चिड़िया चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में। अमराइयाँ घनी हैं कोयल पुकारती है, बहती मलय पवन है, तन मन सँवारती है। वह धर्मभूमि मेरी, वह कर्मभूमि मेरी। वह जन्मभूमि मेरी वह मातृभूमि मेरी। जन्मे जहाँ थे रघुपति, जन्मी जहाँ थी सीता, श्रीकृष्ण ने सुनाई, वंशी पुनीत गीता। गौतम ने जन्म लेकर, जिसका सुयश बढ़ाया, जग को दया सिखाई, जग को दिया दिखाया। वह युद्ध-भूमि मेरी, वह बुद्ध-भूमि मेरी। वह मातृभूमि मेरी, वह जन्मभूमि मेरी।         - Sohan Lal Dwivedi

Kosish karne waalon ki kabhi haar nhi : A poem by Dr. Harivansh Rai Bacchan

this poem by Harivansh Rai bacchan ji is in very simple language but is very inspiring one , specially when you are feeling low.... लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती. नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है. मन का विश्वास रगों में साहस भरता है, चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है. आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती. डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है, जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है. मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में, बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में. मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती. असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो, क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो. जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम, संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम. कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ....        - Dr Harivansh Rai Bacchan

तूफानों की ओर घुमा दो - Shivmangla Suman

Loved this inspirational poem :) आज सिन्धु ने विष उगला है लहरों का यौवन मचला है आज ह्रदय में और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार लहरों के स्वर में कुछ बोलो इस अंधड में साहस तोलो कभी-कभी मिलता जीवन में तूफानों का प्यार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार यह असीम, निज सीमा जाने सागर भी तो यह पहचाने मिट्टी के पुतले मानव ने कभी ना मानी हार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार सागर की अपनी क्षमता है पर माँझी भी कब थकता है जब तक साँसों में स्पन्दन है उसका हाथ नहीं रुकता है इसके ही बल पर कर डाले सातों सागर पार तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार ।।

वीर - by Ramdhari Singh "Dinkar"

सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नही विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं मुँह से न कभी उफ़ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं, शूलों का मूल नसाते हैं, बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं। है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके आदमी के मग में? खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़, मानव जब ज़ोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है। गुण बड़े एक से एक प्रखर, है छिपे मानवों के भीतर, मेंहदी में जैसे लाली हो, वर्तिका-बीच उजियाली हो, बत्ती जो नही जलाता है, रोशनी नहीं वह पाता है।      - Ramdhari Singh Dinkar

Nar ho na Nirash karo mann ko - By Maithili saran gupt

This particular poem always gave me impetus to keep on trying things,Read and think on it. नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ काम करो जग में रह के निज नाम करो। यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो! समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो। कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को। सँभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला! समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना। अखिलेश्वर है अवलम्बन को नर हो न निराश करो मन को।। जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ! तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठ के अमरत्व विधान करो। दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन को।। निज गौरव का नित ज्ञान रहे हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे। सब जाय अभी पर मान रहे मरणोत्तर गुंजित गान रहे। कुछ हो न तजो निज साधन को नर हो न निराश करो मन को।।            - Maithili saran gupt

कर्मवीर - By Ayodhaya Singh Upadhaya "Hariaudh"

I came across this one more poem by Ayodhaya Singh Upadhaya yesterday and found it very motivating .                 देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं।                रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं                काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नही                भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं।।                हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले                सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।।                आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही                सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही                मानते जो भी है सुनते हैं सदा सबकी कही           ...

एक बूंद - Ayodhya singh Upadhyaya " Hariaudh"

 This poem by the famous poet  'Hariaudh"  has always motivated me to take up the new challenges in life . Just wanted to share with all my friends , hoping that it will have same effect on everyone else :)                          ज्यों निकल कर बादलों की गोद से।                        थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी।।                        सोचने फिर फिर यही जी में लगी।                        आह क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।।                        दैव मेरे भाग्य में क्या है बढ़ा।                        में बचूँगी या मिलूँगी धूल में।।         ...

Few lines by me for my Dearest sister

At the age of one year.....   I knocked the heaven's door.... God asked " My son , r you not happy on the beautiful earth where you have your angel mother and divine father" I replied " But i don't have anyone like other children to play with and spend time " God Said " Don't worry , I will make sure that you have the best sister on the earth " Two days later i again knocked the door..... God asked " now what happened" I replied " I need a friend too as other people on the earth have" God said " My dear son, your sister will be your best friend" Down the line after many years ...during my teenage I once again knocked the door..... God asked " r u still unhappy " I replied " I am very happy with my life but there is no one around m to understand me and my thoughts " God said " oh !! that's not a problem , it will b again your sister, who shall unders...