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Innovation Universities

The government has proposed establishment of 14 Innovation Universities during The XIth five-year plan (2007-2012) aimed at world class standards. These Universities would be at the front of making India and global knowledge hub and set benchmarks for excellence for other Central and State Universities. The proposal would also facilitate participation of reputed private sector agencies in establishment of these universities in PPP mode.

Though the concept of innovation universities is very encouraging for Indian higher education, it has its set of challenges and limitations. For example, the execution of this project is not an easy taks in terms of raising resources and allocating them to efficient use. There are others who critique the proposal of innovation universities and suggest that there is a need to raise the quality of all universities gradually instead of few universities radically.

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Following is excerpt from poem Rashmirathi written by Ram dhari singh dinkar. Karna reply to Krishna when he told story of his birth and ask him to join pandava side. सुन-सुन कर कर्ण अधीर हुआ, क्षण एक तनिक गंभीर हुआ,  फिर कहा "बड़ी यह माया है, जो कुछ आपने बताया है  दिनमणि से सुनकर वही कथा मैं भोग चुका हूँ ग्लानि व्यथा  मैं ध्यान जन्म का धरता हूँ, उन्मन यह सोचा करता हूँ,  कैसी होगी वह माँ कराल, निज तन से जो शिशु को निकाल  धाराओं में धर आती है, अथवा जीवित दफनाती है?  सेवती मास दस तक जिसको, पालती उदर में रख जिसको,  जीवन का अंश खिलाती है, अन्तर का रुधिर पिलाती है  आती फिर उसको फ़ेंक कहीं, नागिन होगी वह नारि नहीं  हे कृष्ण आप चुप ही रहिये, इस पर न अधिक कुछ भी कहिये  सुनना न चाहते तनिक श्रवण, जिस माँ ने मेरा किया जनन  वह नहीं नारि कुल्पाली थी, सर्पिणी परम विकराली थी  पत्थर समान उसका हिय था, सुत से समाज बढ़ कर प्रिय था  गोदी में आग लगा कर के, मेरा कुल-वंश छिपा कर के  दुश्मन का उसने काम किया, माताओं को बदनाम किया  माँ...

रश्मिरथी ( सप्तम सर्ग ): कर्ण वध - रामधारी सिंह 'दिनकर'

1 निशा बीती, गगन का रूप दमका, किनारे पर किसी का चीर चमका। क्षितिज के पास लाली छा रही है, अतल से कौन ऊपर आ रही है ? संभाले शीश पर आलोक-मंडल दिशाओं में उड़ाती ज्योतिरंचल, किरण में स्निग्ध आतप फेंकती-सी, शिशिर कम्पित द्रुमों को सेंकती-सी, खगों का स्पर्श से कर पंख-मोचन कुसुम के पोंछती हिम-सिक्त लोचन, दिवस की स्वामिनी आई गगन में, उडा कुंकुम, जगा जीवन भुवन में । मगर, नर बुद्धि-मद से चूर होकर, अलग बैठा हुआ है दूर होकर, उषा पोंछे भला फिर आँख कैसे ? करे उन्मुक्त मन की पाँख कैसे ? मनुज विभ्राट् ज्ञानी हो चुका है, कुतुक का उत्स पानी हो चुका है, प्रकृति में कौन वह उत्साह खोजे ? सितारों के हृदय में राह खोजे ? विभा नर को नहीं भरमायगी यह है ? मनस्वी को कहाँ ले जायगी यह ? कभी मिलता नहीं आराम इसको, न छेड़ो, है अनेकों काम इसको । महाभारत मही पर चल रहा है, भुवन का भाग्य रण में जल रहा है। मनुज ललकारता फिरता मनुज को, मनुज ही मारता फिरता मनुज को । पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है, सहेली सर्पिणी की हो चुकी है, न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह, निगल ही जायगी सद्धर्म को वह । मरे अभिमन्यु अथवा भीष्म टूटें, पिता के प्राण...

मोची

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शब्द हैं विचार हैं

शब्द हैं विचार हैं । शब्दों में विचार है, या विचारों में शब्द है । कभी विचार हैं तो शब्द नहीं, और कभी शब्द हैं तो विचार नहीं । न विचार सदा रहे बंधे, शब्दों के जाल में । न शब्द सर्वदा रहे, विचारों के प्रभाव में । शब्द जो निशब्द है, विचार सब व्यर्थ है । विचार जो भ्रांत है, शब्द सब निरर्थ हैं । उपयुक्त विचार अयुक्त शब्द, युद्ध का प्रारब्ध है । कुटिल विचार मृदु शब्द, विध्वंस का आरम्भ है । शब्द व विचार के इस युद्ध को विराम देकर । विचारों के सागर से शब्दों के मोती निकालकर , उन मोतियों को विचारों के धागों में पिरोने वाला । जिसने इनका निष्कलंक संतुलन है पाया, वही उत्तम मनुष्य है कहलाया ।

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