Skip to main content

Posts

Showing posts with the label harivansh rai bacchan

पथ की पहचान - Path ki Pehchan

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले। पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की जबानी अनगिनत राही गए इस राह से उनका पता क्या पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है खोल इसका अर्थ पंथी पंथ का अनुमान कर ले। पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले। यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना तू इसे अच्छा समझ यात्रा सरल इससे बनेगी सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले। पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले। है अनिश्चित किस जगह पर सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे किस जगह यात्रा खतम हो जाएगी यह भी अनिश्चित है अनिश्चित कब सुमन कब कंटकों के शर मिलेंगे कौन सहसा छू जाएँगे मिलेंगे कौन सहसा आ पड़े कुछ भी रुकेगा तू न ऐसी आन कर ले। पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।             ...

मधुशाला - Madushala by Harivansh Rai Bacchan

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१। प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला, एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला, जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका, आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२। प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला, अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला, मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता, एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३। भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला, कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४। मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला, भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला, उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ, अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५। मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में ...

यात्रा और यात्री - Yatra Aur Yatri by Harivansh Rai Bacchan

साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! चल रहा है तारकों का दल गगन में गीत गाता चल रहा आकाश भी है शून्य में भ्रमता-भ्रमाता पाँव के नीचे पड़ी अचला नहीं, यह चंचला है एक कण भी, एक क्षण भी एक थल पर टिक न पाता शक्तियाँ गति की तुझे सब ओर से घेरे हुए है स्थान से अपने तुझे टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर! साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! थे जहाँ पर गर्त पैरों को ज़माना ही पड़ा था पत्थरों से पाँव के छाले छिलाना ही पड़ा था घास मखमल-सी जहाँ थी मन गया था लोट सहसा थी घनी छाया जहाँ पर तन जुड़ाना ही पड़ा था पग परीक्षा, पग प्रलोभन ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू इस तरफ डटना उधर ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! शूल कुछ ऐसे, पगो में चेतना की स्फूर्ति भरते तेज़ चलने को विवश करते, हमेशा जबकि गड़ते शुक्रिया उनका कि वे पथ को रहे प्रेरक बनाए किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने के लिए मजबूर करते और जो उत्साह का देते कलेजा चीर, ऐसे कंटकों का दल तुझे दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर साँस चलती है तुझे चलन...